बेरोज़गारी: जीवकोपार्जन अथवा आवश्यकता चीजों की पूर्ति के लिए प्रचलित पारिश्रमिक पर काम के योग्यता एवं इच्छा रखने वाले व्यक्ति को कार्य न मिलना ही बेरोज़गारी कहलाता है।
बेरोजगारी मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-
- ऐच्छिक बेरोज़गारी
- अनैच्छिक बेरोज़गारी
ऐच्छिक बेरोज़गारी – इसमें कामगार अपनी इच्छा से बेरोजगार बन कर बैठा रहता है जिसके कई कारण हो सकते है। इसमें आराम करने की इच्छा भी है, आलस्य, किसी अच्छे विकल्प की तलाश हो सकता है। यानी काम की उपलब्धता होते हुए भी काम न करना ही ऐच्छिक बेरोज़गारी कहलाता है।
अनैच्छिक बेरोज़गारी – जब श्रमिक काम करने की इच्छा रखते हैं परंतु उन्हें काम की उपलब्धता नहीं रहने के कारण काम नहीं मिल पाता है और वे बेरोजगार बन जाते हैं।
अनैच्छिक बेरोज़गारी के स्वरूप निम्नलिखित हैं:-
(1) संरचनात्मक बेरोज़गारी – वैसी स्थिति जब पूॅंजी अभाव के कारण कोई देश अपने श्रम शक्ति को रोजगार उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं हो पाता है, इसके फलस्वरूप उत्पन्न बेरोज़गारी को संरचनात्मक बेरोज़गारी कहते हैं।
(2) अदृश्य बेरोज़गारी या छूपी हुई बेरोज़गारी – प्रत्यक्षतः तो ऐसा लगता है कि व्यक्ति के पास रोजगार है परंतु अगर उसे रोजगार से हटाया जाए तो भी कुल उत्पादन में कोई अंतर नहीं आयेगा अर्थात इस श्रमिक की सीमांत उत्पादकता शून्य या ऋणात्मक भी होती है। इसे अदृश्य बेरोज़गारी कहते हैं।
(3) मौसमी बेरोज़गारी – इसके अंतर्गत किसी विशेष मौसम या अवधि में प्रतिवर्ष उत्पन्न होने वाले बेरोज़गारी को सम्मिलित किया जाता है। जब वर्ष में किसी विशेष मौसम तक ही रोजगार उपलब्ध हो। भारत में सामान्यतः यह कृषि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पाया जाता है।
(4) अल्प बेरोज़गारी – जब व्यक्ति कार्यक्षमता के अनुसार कार्य न पाकर अपनी योग्यता व क्षमता से कम स्तर का काम करता हो, तो उसे अल्प बेरोज़गारी कहते हैं।
(5) चक्रीय बेरोज़गारी – व्यापार चक्र के कारण अर्थव्यवस्था में मंदी आती हो फलत: मजदूरों की संख्या में छंटनी करनी पड़ती है यानी आवश्यकता पड़ने पर श्रमिको को काम से हटाया या काम में लगाया जा सकता है। इससे उत्पन्न बेरोज़गारी को चक्रीय बेरोज़गारी कहते हैं। यह प्रायः विकसित अर्थव्यवस्था में पाया जाता है।






