देवघर मेला ( झारखंड ) – बाबा बैद्यनाथ धाम का निर्माण, नामकरण, पौराणिक कथा एवं कांवड़िया यात्रा का इतिहास :
हिन्दू ( सनातन ) धर्म के धर्मग्रंथों के अनुसार वर्ष का सावन मास बड़ा ही शूभ माना जाता है। सावन मास भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। एक माह चलने वाला देवघर मेला, हिन्दू धर्मावलंबी भगवान शिव की भक्ति, अराधना, साधना में भक्तिभाव से लगे रहते हैं। इस दौरान झारखंड के देवघर जिला में देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ मंदिर में भगवान शिव को जलाभिषेक करने के लिए श्रद्धालु-भक्त देश के कोने-कोने से पहुंचे हैं। यहा की कांवड़िया यात्रा भी पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है। इस लेख में हम यहा से जुड़े रहस्य एवं इतिहास को जानेंगे।
बाबा बैद्यनाथ धाम का निर्माण : बाबा बैद्यनाथ धाम के निर्माण को लेकर कई भ्रांतियां इतिहासकारों एवं लेखकों के मन में बनी रहती है। जैसे कुछ किताबें निर्माण को लेकर 8वीं शताब्दी में गुप्तवंश के राजा आदित्यसेन ने करवाया था। लेकिन सर्वमान्य तिथि 1596 ई. माना जाता है और गिद्धौर राजवंश के 10वें राजा पूरणमल ने मुख्य और वर्तमान मंदिर का निर्माण करवाया था। इसी गिद्धौर राजवंश के राजा चन्द्रमौलेश्वर ने 72 फिट ऊंची मंदिर के ऊपर स्वर्ण कलश स्थापित करवाया था। स्वर्ण कलश के ऊपर त्रिशूल के बदले अष्टधातु का बना पंचशूल स्थापित है, जो इस शिव मन्दिर को पूरे भारतवर्ष में अद्वितीय बनाता है। इसके अलावा भारत के किसी भी शिव मंदिर में पंचशूल स्थापित नहीं है। इस पंचशूल को वर्ष में एक बार महाशिवरात्रि के पहले उतारकर विशेष पूजा की जाती है तत्पश्चात पुनः स्थापित कर दिया जाता है। मंदिर के गर्भगृह में भारत के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक ज्योतिर्लिंग यहा है। इस मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावे 22 मंदिर है जो अलग-अलग देवी-देवताओं को समर्पित हैं। इस ज्योतिर्लिंग को मनोकामना ज्योतिर्लिंग कहा जाता है।
नामकरण : देवघर धाम, बाबा धाम, बैद्यनाथ धाम, बैजनाथ धाम नाम क्यों पड़ा? आइए जानते हैं। दरअसल देवघर स्थान पर होने के कारण ‘ देवघर धाम ‘ से प्रचलित है। जबकि बाबा भोलेनाथ शिव की मंदिर होने के कारण एक नाम ‘ बाबा धाम ‘ भी है। ‘ बाबा बैद्यनाथ धाम ‘ और ‘ बैजनाथ धाम ‘ नाम के पिछे का कारण एक पौराणिक कथा से समझते है। जो भगवान शिव एवं लंका के राजा रावण से जुड़ी पौराणिक कथा है।
क्या है ? पौराणिक कथा : लंका के राजा रावण जो एक शक्तिशाली, समृद्ध, संपन्न राज्य का राजा था। जिसके बारे में रामायण में आपने अवश्य सुना होगा। रावण भगवान शिव के अनन्य भक्तों में से एक था। रावण की इच्छा हुई कि यदि भगवान शिव खुश कर लंका में ले आऊं तो लंका सभी तरह से पूर्ण हो जाएगा। रावण के नाम से मानव तो क्या दैत्य-दानव सभी डरते थें। वह चाहता था कि पूरी पृथ्वी पर हमारा नियंत्रण हो यहा तक कि वह देवी-देवताओं को भी बस में रखना चाहता था। इसके लिए उसने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत पहुंचा और कई वर्षों तक शिव की तपस्या किया लेकिन भगवान शिव दर्शन नहीं दिए। निराश रावण ने एक-एक कर अपना सिर भगवान शिव को समर्पित करने लगा जब दशवा सिर काटने लगा तभी भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए और कटे हुए सिरों को ठीक किया। यहां भगवान शिव ने रावण के लिए वैद्य के रूप में काम किया इस लिए एक नाम ‘ बाबा बैद्यनाथ धाम ‘ पड़ा। भगवान शिव ने रावण से पूछा, “ मांग, क्या चाहते हो ?”
रावण इच्छानुसार भगवान शिव को लंका में निवास करने यानि लंका ले जाने की इच्छा प्रगट की । भगवान शिव ने शिवलिंग देकर रावण को निर्देशित किया कहा,” इस शिवलिंग में मेरी आत्मा निवास करती है इसे ले जाओ, परंतु ख्याल रहे कि लंका पहुंचते तक शिवलिंग का धर्ति से स्पर्श नहीं होना चाहिए ।”
रावण उस शिवलिंग को लेकर लंका के लिए प्रस्थान किया। इधर देवताओं के बीच हलचल फैल गई कि यदि रावण शिव को ले जाएगा तो अनर्थ हो जाएगा। इसलिए भगवान विष्णु ने वरूण देव ( जल के देवता ) को रावण को रोकने हेतु, उसके पेट में समा जाने को कहा जिससे उसे लघुशंका आ जाए। ऐसा ही हुआ। जब रावण देवघर के जंगल से गुजर रहा था, तभी उसे लघुशंका लगी और शिवलिंग को एक ग्वाला जिसे ‘ बैजु ‘ नाम था, को हाथों में दिया और लघुशंका करने लगा। वरूण देव की कृपा से उसे लघुशंका होता रहा। और उधर ग्वाला बैजु शिवलिंग को जमीन पर रख कर अपने घर चल दिया चुकी शाम हो चला था, उसकी सभी गायें घर को चलि गई थीं। तभी भगवान वरूण देव की कृपा से रावण की लघुशंका खत्म हुई। और शिवलिंग को उठाने का प्रयास किया लेकिन असफल रहा। अब वह देवताओं के षड्यंत्र को समझ गया और खाली हाथ लंका की ओर चल दिया।
उधर ग्वाला बैजु अपनी गायों को उस जंगल में प्रतिदिन चराना जारी रखा। कुछ दिनों से जब एक गाय दूध देना अचानक बंद कर दी, तो उसे कुछ संदेह हुआ और उसपर निगरानी रखने लगा। एक दिन बैजु ने देखा कि शाम में जब सभी गायों को घर जाने का वक्त हुआ, वह गाय उसी शिवलिंग के उपर अपनी दुध गिरा रही है। इसे देख बैजु समझ गया कि इस शिवलिंग के चलते मेरी गईया दुध नहीं दे रही है। बैजु ने इसके बदले नित्यदीन सुबह उस शिवलिंग के ऊपर पांच ठंडे लगाने लगा। एक दिन बैजु डंडा लगाना भुल गया था और खाना खाने बैठा तभी उसे याद आया कि मैं तो आज उस पत्थर पर डंडा लगाया ही नहीं। उसने खाना छोड़कर जंगल में जाकर पांच डंडा लगाया। तभी भगवान शिव उसके अंतरात्मा को कहा कि तुम मुझे नित्यदीन डंडा लगाने के नियत से ही लेकिन याद तो करते हो, इसलिए यह स्थान ( मंदिर ) तुम्हारे नाम से जाना जाएगा। इस लिए देवघर का एक नाम “ बैजनाथ धाम” भी पड़ा।
मुख्य मंदिर के सटे एक मंदिर मां पार्वती की मंदिर है जो भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है। कहा जाता है कि माता सती का सीर इसी स्थान पर गिरा था। इसलिए यहां ‘ शिव-शक्ति ‘ का संगम है। श्रद्धालुओं के द्वारा सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है।
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