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झारखंड आंदोलन का इतिहास

By NPA
On: April 14, 2026 3:57 AM
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प्रस्तावना

झारखंड आंदोलन भारत के उन आंदोलनों में से एक था, जिसने वर्षों तक उपेक्षा और शोषण के खिलाफ संघर्ष करते हुए एक अलग राज्य की माँग को जन्म दिया। आदिवासी पहचान, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा की भावना ने इस आंदोलन को जन्म दिया, जो अंततः 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य की स्थापना के साथ पूरा हुआ।

झारखंड शब्द का अर्थ

‘झारखंड’ शब्द का अर्थ है – ‘झाड़ियों का प्रदेश’ या ‘वनों का प्रदेश’। यह क्षेत्र झार, जंगल और पहाड़ियों से आच्छादित रहा है और आदिकाल से आदिवासी समुदायों का निवास स्थान रहा है।

आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1. ब्रिटिश शासन से पूर्व

  • झारखंड क्षेत्र में मुंडा, संथाल, हो, उरांव आदि आदिवासी समुदाय रहते थे।
  • उनके पास खुद की भूमि, संस्कृति और शासन प्रणाली (मानकी-परगनैती) थी।
  • बाहरी ज़मींदारों और महाजनों द्वारा शोषण की शुरुआत हुई।

2. ब्रिटिश काल में विद्रोह

  • चुआड़ विद्रोह (1769–1809)
  • संथाल विद्रोह (1855) – सिद्धू और कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में
  • मुंडा विद्रोह (उलगुलान – 1899-1900) – बिरसा मुंडा के नेतृत्व में
  • इन आंदोलनों ने अलग पहचान की चेतना को जन्म दिया

आधुनिक झारखंड आंदोलन की शुरुआत

  • 1930 के दशक में झारखंड पार्टी का गठन
  • जयपाल सिंह मुंडा – ऑक्सफोर्ड शिक्षित नेता और आदिवासी अस्मिता के प्रतीक
  • संविधान सभा में झारखंड के लिए अलग राज्य की माँग
  • 1950–60 के दशक में आंदोलन को राजनीतिक रूप से दबा दिया गया

मुख्य चरण और संगठन

चरणसंगठन/नेताविवरण
1950s–60sझारखंड पार्टी (जयपाल सिंह)अलग राज्य की माँग, बाद में कांग्रेस में विलय
1970sJMM (झारखंड मुक्ति मोर्चा) – श्यिबू सोरेनआदिवासी अधिकार, खनिज संपदा की लूट के खिलाफ आंदोलन
1980s–90sझारखंड समन्वय समितिराजनीतिक दलों का सहयोग
1990sसंसद में प्रस्ताव, जनांदोलनआंदोलन तेज, संसद में बहसें शुरू
2000केंद्र सरकार द्वारा झारखंड राज्य निर्माण की घोषणा

झारखंड राज्य का निर्माण

  • 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर झारखंड भारत का 28वां राज्य बना
  • यह दिन बिरसा मुंडा की जयंती भी है, जो आदिवासी चेतना के प्रतीक थे
  • राजधानी: रांची

आंदोलन के मुख्य कारण

  • आदिवासियों की भूमि अधिग्रहण और विस्थापन
  • खनिज संसाधनों की लूट – उद्योगपतियों के हाथों में
  • भाषा, संस्कृति और परंपराओं की अनदेखी
  • रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी

निष्कर्ष

झारखंड आंदोलन केवल एक राजनीतिक संघर्ष नहीं था, यह एक सांस्कृतिक और सामाजिक पुनर्जागरण था। इस आंदोलन ने आदिवासी समाज को अपनी पहचान, अधिकार और सम्मान के लिए लड़ने की प्रेरणा दी। आज झारखंड राज्य बना है, लेकिन उस आंदोलन की भावना तब तक पूरी नहीं होगी जब तक यहाँ के लोगों को न्याय, विकास और समानता नहीं मिलती।

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