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झारखंड में मिली 3200 साल पुरानी सभ्यता! हजारीबाग की इस खोज से बदल सकता है भारतीय इतिहास

By NPA
On: May 26, 2026 8:26 AM
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झारखंड के हजारीबाग जिले से सामने आई एक नई पुरातात्विक खोज ने इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। मोहाने नदी घाटी के आसपास मिले पुरातात्विक साक्ष्यों ने संकेत दिया है कि यह क्षेत्र करीब 3,200 वर्षों से मानव बसावट का केंद्र रहा है। सबसे खास बात यह है कि यहां प्रागैतिहासिक काल, लौह युग और प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तक लगातार मानव निवास के प्रमाण मिले हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज न केवल झारखंड के इतिहास को नई पहचान देगी, बल्कि भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक विकास के कई स्थापित दृष्टिकोणों को भी चुनौती दे सकती है।

कहां मिली यह ऐतिहासिक खोज?

यह महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल झारखंड के हजारीबाग जिले के चौपारण प्रखंड में स्थित मोहाने नदी बेसिन में फैला हुआ है। इसके प्रमुख अवशेष दाइहार, सोहरा, मंगरह और हथिंदर गांवों के आसपास पाए गए हैं।

इतिहासकारों के अनुसार यह क्षेत्र प्राचीन भारत के प्रसिद्ध उत्तरापथ व्यापारिक मार्ग पर स्थित था। यही मार्ग बाद में शेरशाह सूरी के समय और ब्रिटिश शासन में विकसित होकर ग्रैंड ट्रंक रोड के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

इसके अलावा यह इलाका बोधगया के बेहद करीब है, जिससे संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में बौद्ध गतिविधियों और व्यापारिक संपर्कों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा।

कैसे हुई इस प्राचीन सभ्यता की पहचान?

स्थानीय ग्रामीणों और शोधकर्ताओं ने दशकों पहले यहां प्राचीन अवशेषों की मौजूदगी की ओर संकेत किया था। हालांकि हाल के वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की टीमों ने वैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से इस क्षेत्र की गहन जांच की।

भूमिगत संरचनाओं को बिना नुकसान पहुंचाए खोजने के लिए IIT-ISM धनबाद और विश्व-भारती विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) तकनीक का उपयोग किया। इस तकनीक से जमीन के भीतर 100 फीट से अधिक लंबी विशाल संरचनाओं का पता चला, जिसने शोधकर्ताओं को चौंका दिया।

खुदाई और सर्वेक्षण में क्या-क्या मिला?

1. उत्तरी काले चमकीले मृदभांड (NBPW)

यहां से बड़ी संख्या में उत्तरी काले पॉलिशदार मिट्टी के बर्तन मिले हैं। यह प्राचीन भारत के द्वितीय नगरीकरण काल की पहचान माने जाते हैं और उस समय की आर्थिक समृद्धि तथा विकसित जीवनशैली को दर्शाते हैं।

2. विभिन्न कालखंडों के मिट्टी के बर्तन

सर्वेक्षण में ताम्रपाषाण काल से लेकर मौर्य और गुप्तोत्तर काल तक के मिट्टी के बर्तनों के अवशेष मिले हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र हजारों वर्षों तक लगातार आबाद रहा।

3. लौह उद्योग के प्रमाण

स्थल से भारी मात्रा में आयरन स्लैग (लोहे का धातुमल) प्राप्त हुआ है। यह संकेत देता है कि यहां के निवासी लोहे को गलाने और उससे उपकरण बनाने की उन्नत तकनीक जानते थे। इससे झारखंड की प्राचीन औद्योगिक परंपरा भी उजागर होती है।

4. 2500 वर्ष पुराना विशाल बौद्ध स्तूप

मंगरह गांव के एक ऊंचे टीले के नीचे दबा हुआ विशाल बौद्ध स्तूप मिला है, जिसकी आयु लगभग 2500 वर्ष आंकी जा रही है। यह खोज क्षेत्र में बौद्ध धर्म के प्रभाव का मजबूत प्रमाण मानी जा रही है।

5. टेराकोटा रिंग वेल्स

यहां मिट्टी से बने गोलाकार रिंग वेल्स भी मिले हैं, जिनका उपयोग जल संचयन और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता था।

6. प्राचीन बौद्ध मूर्तियां

दाइहार और सोहरा गांवों से देवी मारीचि और तारा की पत्थर की मूर्तियां मिली हैं। दिलचस्प बात यह है कि स्थानीय ग्रामीण इन मूर्तियों को लंबे समय से लोक देवियों के रूप में पूजते रहे हैं।

इस खोज की सबसे बड़ी खासियत क्या है?

3200 वर्षों की निरंतर मानव बसावट

यह कोई एक कालखंड की बस्ती नहीं है। यहां अलग-अलग समय की सांस्कृतिक परतें मिली हैं, जो दर्शाती हैं कि यह क्षेत्र हजारों वर्षों तक लगातार आबाद रहा।

प्राचीन लिपि का रहस्य

कुछ मूर्तियों और पत्थर के अवशेषों पर एक विशेष प्राचीन लिपि अंकित मिली है। इसकी पहचान और काल निर्धारण के लिए विशेषज्ञों द्वारा अध्ययन किया जा रहा है। यदि यह लिपि पढ़ ली जाती है, तो इतिहास के कई नए तथ्य सामने आ सकते हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज?

1. झारखंड के इतिहास को मिलेगी नई पहचान

अब तक छोटानागपुर और झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों को मुख्यधारा की प्राचीन सभ्यताओं से अपेक्षाकृत अलग माना जाता था। लेकिन यह खोज बताती है कि यहां भी गंगा घाटी की सभ्यताओं के समानांतर विकसित और संगठित बस्तियां मौजूद थीं।

2. व्यापार और उद्योग का बड़ा केंद्र था यह क्षेत्र

उत्तरापथ व्यापार मार्ग पर स्थित होने के कारण यह क्षेत्र प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण व्यापारिक नेटवर्क से जुड़ा हुआ था। लौह धातुकर्म के साक्ष्य बताते हैं कि यहां आर्थिक गतिविधियां काफी विकसित थीं।

3. बौद्ध धर्म के प्रसार का प्रमुख केंद्र

बोधगया की निकटता और विशाल स्तूप की मौजूदगी यह साबित करती है कि यह क्षेत्र बौद्ध भिक्षुओं, यात्रियों और व्यापारियों के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव रहा होगा। इससे झारखंड को राष्ट्रीय बौद्ध सर्किट में विशेष महत्व मिल सकता है।

4. सांस्कृतिक निरंतरता का अनूठा उदाहरण

स्थानीय लोगों द्वारा सदियों से पूजी जा रही मूर्तियों का प्राचीन बौद्ध विरासत से संबंध होना यह दर्शाता है कि किस प्रकार भारतीय समाज में विभिन्न संस्कृतियां समय के साथ एक-दूसरे में समाहित होती रही हैं।

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