होम जे.एस.एस.सी. एस.एस.सी. कर्रेंट अफेयर्स प्रेक्टिस क्विज ब्लॉग प्रारंभिक परीक्षा मुख्य परीक्षा अन्य

बिरसा मुंडा का उलगुलान आंदोलन (1899-1900): इतिहास, कारण, घटनाएँ और प्रभाव

By NPA
On: May 29, 2026 1:21 AM
Share:

बिरसा मुंडा का उलगुलान आंदोलन

उलगुलान आंदोलन
---Advertisement---

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी समाज का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इन्हीं महान संघर्षों में बिरसा मुंडा का उलगुलान आंदोलन (1899-1900) एक ऐतिहासिक विद्रोह था। “उलगुलान” का अर्थ है महाविद्रोह या महान हलचल। यह आंदोलन ब्रिटिश शासन, जमींदारों और महाजनों द्वारा आदिवासियों के शोषण के विरुद्ध चलाया गया था। इस आंदोलन का नेतृत्व महान आदिवासी नेता Birsa Munda ने किया था, जिन्हें आज भी “धरती आबा” (धरती के पिता) के रूप में सम्मान दिया जाता है।

उलगुलान आंदोलन की पृष्ठभूमि

19वीं शताब्दी के अंत में छोटानागपुर क्षेत्र (वर्तमान झारखंड) के आदिवासियों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी। ब्रिटिश शासन ने पारंपरिक खुंटकट्टी भूमि व्यवस्था को कमजोर कर दिया था। इसके परिणामस्वरूप बाहरी लोग (दिकू), जमींदार और महाजन आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा करने लगे। आदिवासियों से बेगार कराई जाती थी और उन पर भारी कर लगाए जाते थे।

इन परिस्थितियों ने आदिवासी समाज में असंतोष पैदा किया और यही असंतोष आगे चलकर उलगुलान आंदोलन का आधार बना।

बिरसा मुंडा का जन्म

1875 में झारखंड के उलीहातु गाँव में जन्मे बिरसा मुंडा ने कम आयु में ही आदिवासी समाज की समस्याओं को समझ लिया था। उन्होंने सामाजिक सुधार, धार्मिक जागरण और आदिवासी एकता का संदेश दिया। उन्होंने लोगों को अंधविश्वास, नशाखोरी और सामाजिक कुरीतियों से दूर रहने की प्रेरणा दी।

बिरसा मुंडा का प्रसिद्ध नारा था:

“अबुआ राज एते जाना, महारानी राज तुंदु जाना”

अर्थात् “हमारा राज स्थापित होगा और महारानी का राज समाप्त होगा।”

उलगुलान आंदोलन के प्रमुख कारण

1. भूमि हड़पने की नीति

ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण आदिवासियों की पारंपरिक भूमि व्यवस्था समाप्त होने लगी और उनकी जमीनें बाहरी लोगों के हाथों में जाने लगीं।

2. आर्थिक शोषण

महाजन और जमींदार आदिवासियों से अत्यधिक कर वसूलते थे और उन्हें कर्ज के जाल में फँसाकर उनकी भूमि छीन लेते थे।

3. बेगार प्रथा

आदिवासियों को बिना मजदूरी के जबरन काम कराया जाता था, जिसे “बेथ बेगारी” कहा जाता था।

4. सांस्कृतिक और धार्मिक हस्तक्षेप

मिशनरियों और औपनिवेशिक नीतियों के कारण आदिवासी संस्कृति और परंपराओं पर खतरा बढ़ गया था।

उलगुलान आंदोलन की शुरुआत

24 दिसंबर 1899 को बिरसा मुंडा ने उलगुलान की घोषणा की। हजारों आदिवासी उनके नेतृत्व में एकत्र हुए और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष शुरू कर दिया। आंदोलन तेजी से खूँटी, तमाड़, रांची और आसपास के क्षेत्रों में फैल गया।

आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था:

  • आदिवासियों की भूमि की रक्षा
  • ब्रिटिश शासन का विरोध
  • शोषणकारी जमींदारी व्यवस्था का अंत
  • “मुण्डा राज” की स्थापना

डोम्बारी बुरू का युद्ध

उलगुलान आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण घटना डोम्बारी बुरू की लड़ाई थी। जनवरी 1900 में हजारों आदिवासी इस पहाड़ी पर एकत्र हुए। ब्रिटिश सेना ने उन पर गोलीबारी कर दी, जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी मारे गए। यह घटना आदिवासी इतिहास की सबसे दुखद और वीरतापूर्ण घटनाओं में से एक मानी जाती है।

बिरसा मुंडा की गिरफ्तारी

ब्रिटिश सरकार ने बिरसा मुंडा को पकड़ने के लिए इनाम घोषित किया। अंततः 3 फरवरी 1900 को उन्हें चक्रधरपुर के निकट जंगल क्षेत्र से गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी गिरफ्तारी के बाद आंदोलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया।

बिरसा मुंडा की मृत्यु

9 जून 1900 को रांची जेल में बिरसा मुंडा की मृत्यु हो गई। उस समय उनकी आयु केवल 25 वर्ष थी। उनकी मृत्यु के कारणों को लेकर आज भी विभिन्न मत मौजूद हैं, लेकिन उनकी शहादत ने उन्हें अमर बना दिया।

उलगुलान आंदोलन के परिणाम

1. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908

उलगुलान आंदोलन के प्रभाव से ब्रिटिश सरकार को Chotanagpur Tenancy Act लागू करना पड़ा, जिसने आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित करने पर प्रतिबंध लगाया।

2. आदिवासी चेतना का विकास

इस आंदोलन ने आदिवासी समाज में राजनीतिक और सामाजिक चेतना को मजबूत किया।

3. स्वतंत्रता आंदोलन को प्रेरणा

उलगुलान ने भविष्य के कई जनजातीय और स्वतंत्रता आंदोलनों को प्रेरित किया।

4. झारखंड आंदोलन की आधारशिला

कई इतिहासकार उलगुलान आंदोलन को झारखंड राज्य निर्माण की वैचारिक नींव मानते हैं।

भारतीय इतिहास में उलगुलान आंदोलन का महत्व

उलगुलान केवल एक विद्रोह नहीं था, बल्कि यह आदिवासी स्वाभिमान, भूमि अधिकार और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का आंदोलन था। इसने यह सिद्ध किया कि भारत के आदिवासी समुदाय भी औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध संगठित होकर संघर्ष कर सकते हैं।

FAQ

उलगुलान आंदोलन कब हुआ था?

उलगुलान आंदोलन 1899-1900 के बीच हुआ था।

उलगुलान आंदोलन का नेता कौन था?

इस आंदोलन का नेतृत्व बिरसा मुंडा ने किया था।

उलगुलान का अर्थ क्या है?

उलगुलान का अर्थ “महाविद्रोह” या “महान हलचल” है।

डोम्बारी बुरू का क्या महत्व है?

यहीं पर ब्रिटिश सेना और आदिवासियों के बीच सबसे महत्वपूर्ण संघर्ष हुआ था।

उलगुलान आंदोलन का सबसे बड़ा परिणाम क्या था?

1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, जिसने आदिवासी भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित की।

NPA

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

और पढ़ें

Leave a Comment