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हर्षवर्धन का शासन और उपलब्धियाँ

By NPA
On: April 14, 2026 3:57 AM
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प्रस्तावना

गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर भारत में राजनीतिक अस्थिरता व्याप्त हो गई थी। इसी समय हर्षवर्धन (606–647 ई.) ने एक शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना कर भारत में फिर से एकता और स्थिरता लाई। वह न केवल एक विजेता राजा था, बल्कि एक महान संस्कृति प्रेमी, धर्म संरक्षक और विद्वान भी था।

हर्षवर्धन का प्रारंभिक जीवन

  • जन्म: 590 ई., स्थान: थानेसर (हरियाणा)
  • वंश: पुष्यभूति वंश
  • पिता: प्रभाकरवर्धन, भाई: राज्यवर्धन
  • राज्यवर्धन की हत्या के बाद हर्ष ने 606 ई. में गद्दी संभाली
  • राजधानी: कन्नौज

साम्राज्य का विस्तार

  • उत्तर भारत के अधिकांश भागों पर हर्ष का अधिकार था
  • बंगाल, असम, पंजाब, राजस्थान, गुजरात और मध्य भारत तक प्रभाव
  • दक्षिण भारत के पल्लव शासक पुलकेशिन II से पराजित (नर्मदा नदी सीमांत)

प्रशासन व्यवस्था

  • केन्द्रीयकृत लेकिन सहिष्णु प्रशासन
  • अधिकारी: उपरिक, विश्वपति, औग्र, महापात्र
  • कर प्रणाली सरल और व्यवस्थित
  • जनता पर अत्याचार नहीं था — ‘राजधर्म’ का पालन होता था
  • गाँव और नगरों में स्वशासन की व्यवस्था

धार्मिक नीति

  • हर्ष प्रारंभ में हिंदू शैव धर्म का अनुयायी था
  • बाद में बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुआ
  • चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार हर्ष बौद्ध धर्म का संरक्षक था
  • उसने बौद्ध विहार, मंदिर, धर्मशालाएँ और अस्पताल बनवाए
  • कन्यकुब्ज (कन्नौज) धर्मसभा और प्रयाग महाधान का आयोजन किया

साहित्य, कला और संस्कृति

  • स्वयं एक लेखक था: संस्कृत में 3 नाटक लिखे:
    1. नागानंद
    2. रत्नावली
    3. प्रियदर्शिका
  • कवि बाणभट्ट — ‘हर्षचरित’ और ‘कादंबरी’ के रचयिता
  • ह्वेनसांग के अनुसार भारत में शिक्षा और संस्कृति का पुनरुत्थान
  • नालंदा विश्वविद्यालय को संरक्षण प्रदान किया

ह्वेनसांग का भारत आगमन

  • चीन से आए बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग ने हर्ष के शासनकाल का विस्तृत वर्णन किया
  • वह हर्ष के दरबार में सम्मानित अतिथि रहा
  • उसके लेख भारत के सामाजिक, धार्मिक और प्रशासनिक जीवन का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं

हर्ष की मृत्यु और उत्तराधिकार

  • हर्ष की मृत्यु 647 ई. में हुई
  • उसकी कोई योग्य संतान नहीं थी
  • मृत्यु के बाद साम्राज्य फिर से छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया

निष्कर्ष

हर्षवर्धन का शासन गुप्त काल के बाद भारत में सांस्कृतिक और राजनीतिक एकता का एक नया अध्याय था। वह एक ऐसा सम्राट था, जिसने शक्ति के साथ साथ ज्ञान, सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता को महत्व दिया। उसकी उपलब्धियाँ आज भी भारत के इतिहास में प्रेरणास्रोत हैं।

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