झारखंड की धरती हमेशा से वीरों की भूमि रही है, और जब भी भारत की स्वतंत्रता की बात होती है, तो 1857 की क्रांति में शामिल निलांबर और पितांबर का नाम गर्व से लिया जाता है। ये दो भाई केवल योद्धा नहीं थे, बल्कि जनजातीय समाज के आत्मसम्मान, साहस और बलिदान की प्रतिमूर्ति थे। आइए जानें इन महान सपूतों की पूरी कहानी।
प्रारंभिक जीवन
नीलाम्बर और पीताम्बर का जन्म वर्तमान झारखंड राज्य के पलामू अब गढ़वा जिले के चेमो-सनेया गांव में हुआ था। वे खरवार जनजाति से ताल्लुक रखते थे। इनका परिवार पारंपरिक रूप से जमींदार था, लेकिन उनके पिता चेमू सिंह एक न्यायप्रिय और गरीबों के हितैषी व्यक्ति थे।
चेमू सिंह अक्सर गरीब किसानों से लगान नहीं लेते थे या उन्हें माफ कर देते थे। इस कारण वे ब्रिटिश सरकार की नजर में असहयोगी बन गए थे। नीलाम्बर और पीताम्बर बचपन से ही अपने पिता के इन आदर्शों से प्रभावित थे।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| जन्म स्थान | चेमो-सनेया, पलामू अब गढ़वा, झारखंड |
| पूरा नाम | नीलाम्बर खरवार एवं पीताम्बर खरवार |
| पिता | चेमू सिंह |
| माता | सनया देवी |
| समुदाय/ जाती | खरवार |
| धर्म | हिन्दू |
| आंदोलन | 1857 की क्रांति में भागीदारी |
| प्रमुख घटनाएं | चैनपुर व लेस्लीगंज पर हमला, पलामू किले की लड़ाई |
| गिरफ्तारी व फांसी | 28 मार्च 1859, लेस्लीगंज |
| सम्मान | निलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय, IIM रांची में भवनों के नामकरण |

1857 की क्रांति और विद्रोह की शुरुआत
सन 1857 भारत के इतिहास में एक निर्णायक वर्ष था। जब देशभर में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी फैली, तब झारखंड की भूमि भी इससे अछूती नहीं रही।
विश्वनाथ शाहदेव और गणपत राय जैसे क्रांतिकारियों के प्रभाव से प्रेरित होकर, नीलाम्बर और पीताम्बर ने भी अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने आसपास के ग्रामीणों, खासकर आदिवासी समुदायों को संगठित कर लगभग 500 लोगों की सेना खड़ी की।
महत्वपूर्ण युद्ध और संघर्ष
चैनपुर पर हमला (21 अक्टूबर 1857)
- इन वीर भाइयों ने सबसे पहले ब्रिटिश समर्थक रघुवर दयाल के घर पर हमला किया।
- यह हमला चैनपुर में हुआ और अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक स्पष्ट उद्घोषणा थी।
लेस्लीगंज की लड़ाई
- इसके बाद निलांबर-पितांबर की सेना ने लेस्लीगंज में अंग्रेजों को भारी क्षति पहुंचाई।
- लेफ्टिनेंट ग्राहम द्वारा संचालित ब्रिटिश सेना निलांबर-पितांबर के हमलों से बौखला गई थी।
पलामू किला की लड़ाई
- विद्रोह बढ़ने पर ब्रिटिश कमिश्नर ई.एल. डाल्टन ने मद्रास रेजीमेंट के साथ पलामू पर हमला किया।
- पलामू किला निलांबर-पितांबर का मजबूत ठिकाना था।
- अंग्रेजों के भारी हथियारों के आगे वे ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाए, और किला अंग्रेजों के हाथ लग गया।
जंगलों में संघर्ष और गुरिल्ला युद्ध
किला हाथ से जाने के बाद भी निलांबर और पितांबर ने हार नहीं मानी। वे झारखंड के घने जंगलों में छिपकर गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाते रहे।
ये युद्ध शैली अंग्रेजों के लिए परेशानी का कारण बनी रही। लेकिन लगातार पीछा और मुखबिरी के कारण वे आखिरकार पकड़े गए।
गिरफ्तारी और शहादत
28 मार्च 1859 को इन दोनों वीर भाइयों को लेस्लीगंज में फांसी दे दी गई। यह दिन झारखंड के इतिहास में बलिदान दिवस के रूप में याद किया जाता है।

निलांबर-पितांबर की विरासत
🏛️ निलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय
इनकी स्मृति में झारखंड सरकार ने “निलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय” की स्थापना की, जो जनवरी 2009 में मेदिनीनगर (पलामू) में स्थापित हुआ।
🏢 IIM रांची का सम्मान
2024 में, IIM रांची ने भी इन वीरों के सम्मान में अपने दो मुख्य भवनों का नाम “निलांबर ब्लॉक” और “पीतांबर ब्लॉक” रखा।
झारखंड की पहचान
निलांबर और पितांबर आज केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज नाम नहीं हैं, बल्कि वे झारखंड के जनजातीय आत्मगौरव, स्वतंत्रता और बलिदान के प्रतीक हैं।
इनकी वीरता यह सिखाती है कि संघर्ष में चाहे कितनी भी कठिनाई क्यों न हो, सच्चाई और न्याय के लिए खड़ा होना ही असली वीरता है।