
दक्षिण कोरिया में भारत के वीरों को ऐतिहासिक सम्मान
हाल ही में Rajnath Singh ने Seoul के निकट स्थित Imjingak Park में पहले भारतीय युद्ध स्मारक (Indian War Memorial) का उद्घाटन किया। यह स्मारक कोरियाई युद्ध (1950-53) की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर बनाया गया है और इसे भारत के रक्षा मंत्रालय द्वारा विकसित किया गया है।
यह स्मारक सिर्फ एक संरचना नहीं, बल्कि उन भारतीय सैनिकों के साहस, सेवा और मानवीय योगदान का प्रतीक है जिन्होंने कोरियाई युद्ध के दौरान हजारों लोगों की जान बचाई और शांति स्थापना में अहम भूमिका निभाई।
राजनाथ सिंह और दक्षिण कोरिया के मंत्री ने किया संयुक्त उद्घाटन
इस ऐतिहासिक स्मारक का उद्घाटन Rajnath Singh और दक्षिण कोरिया के देशभक्त एवं पूर्व सैनिक मामलों के मंत्री Kwon Oh-eul ने संयुक्त रूप से किया।
इस मौके पर दोनों देशों ने युद्ध दिग्गजों के कल्याण, अकादमिक सहयोग और ऐतिहासिक संस्मरणों के संरक्षण के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर भी हस्ताक्षर किए।
‘हिंद नगर’ की ऐतिहासिक भूमि पर बना स्मारक
यह स्मारक उस ऐतिहासिक स्थान पर बनाया गया है जहां सितंबर 1954 में भारत की कस्टोडियन फोर्स ऑफ इंडिया (CFI) ने ‘हिंद नगर’ की स्थापना की थी।
युद्धविराम के बाद लगभग 22,000 युद्ध बंदियों (POWs) को यहां मानवीय आधार पर रखा गया था, जब तक कि उन्हें सुरक्षित रूप से उनके देशों में वापस नहीं भेज दिया गया।
भारत की इस भूमिका को दुनिया भर में निष्पक्षता, संवेदनशीलता और मानवता की मिसाल माना गया था।
कोरियाई युद्ध में भारत की ऐतिहासिक भूमिका
1. 60 पैरा फील्ड एम्बुलेंस: ‘मरून एंजेल्स’ की कहानी
कोरियाई युद्ध के दौरान भारत की सबसे बड़ी मानवीय भूमिका 60 पैरा फील्ड एम्बुलेंस यूनिट ने निभाई थी।
इस यूनिट का नेतृत्व A. G. Rangaraj ने किया था, जिन्हें उनकी वीरता और सेवा के लिए महावीर चक्र (MVC) से सम्मानित किया गया।

इस यूनिट की बड़ी उपलब्धियां
- 2.2 लाख से अधिक घायल सैनिकों और नागरिकों का इलाज
- 2,300 से ज्यादा मैदानी ऑपरेशन
- भीषण गोलाबारी के बीच लगातार चिकित्सा सेवा
- युद्धग्रस्त क्षेत्रों में मानवीय सहायता
उनकी निस्वार्थ सेवा से प्रभावित होकर संयुक्त राष्ट्र सैनिकों और दक्षिण कोरियाई नागरिकों ने उन्हें ‘मरून एंजेल्स’ नाम दिया था।
दक्षिण कोरिया ने मई 2026 का महीना कर्नल रंगराज की स्मृति को समर्पित किया है, जो भारत के लिए गर्व की बात है।
2. कस्टोडियन फोर्स ऑफ इंडिया (CFI) की भूमिका
1953 के युद्धविराम समझौते के बाद युद्ध बंदियों के पुनर्वास और प्रत्यावर्तन के लिए Neutral Nations Repatriation Commission (NNRC) का गठन किया गया।

इस आयोग की अध्यक्षता K. S. Thimayya ने की थी।
भारत की कस्टोडियन फोर्स ऑफ India (CFI) ने हजारों युद्ध बंदियों को बिना किसी बल प्रयोग के सुरक्षित रूप से उनके देशों तक पहुंचाने का काम किया।
भारत की इस शांतिपूर्ण और मानवीय भूमिका की पूरी दुनिया में सराहना हुई थी।
भारत-दक्षिण कोरिया संबंधों को मिलेगा नया बल
यह युद्ध स्मारक भारत और दक्षिण कोरिया के बीच ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ को और मजबूत करेगा।
रक्षा मंत्री Rajnath Singh ने कहा कि यह स्मारक दोनों देशों के साझा बलिदान, साहस, करुणा और त्याग का प्रतीक है।
रक्षा क्षेत्र में बढ़ेगा सहयोग
यात्रा के दौरान दोनों देशों ने India-Korea Defence Innovation Accelerator Ecosystem (KIND-X) पर भी चर्चा की। इसका उद्देश्य रक्षा स्टार्ट-अप, तकनीकी नवाचार और आधुनिक रक्षा प्रणालियों में सहयोग बढ़ाना है।
इसके अलावा भारत ने दक्षिण कोरियाई रक्षा कंपनियों को ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत भारत के रक्षा गलियारों में निवेश करने के लिए आमंत्रित किया।
क्यों खास है यह भारतीय युद्ध स्मारक?
- दक्षिण कोरिया में बना पहला भारतीय युद्ध स्मारक
- कोरियाई युद्ध में भारत की मानवीय भूमिका को वैश्विक सम्मान
- भारत-दक्षिण कोरिया रणनीतिक संबंधों को मजबूती
- भारतीय सैनिकों के साहस और सेवा का अंतरराष्ट्रीय प्रतीक
- आने वाली पीढ़ियों को इतिहास से जोड़ने वाला स्मारक