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रोहतास के महान खरवार नरेश राजा प्रताप धवलदेव : इतिहास, संस्कृति और लोककल्याण के अमर प्रतीक

By NPA
On: June 5, 2026 9:48 PM
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बिहार का रोहतास क्षेत्र प्राचीन काल से ही अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामरिक महत्ता के लिए प्रसिद्ध रहा है। कैमूर पर्वतमाला की दुर्गम पहाड़ियों, प्राचीन मंदिरों, शिलालेखों और रोहतासगढ़ जैसे अभेद्य दुर्गों ने इस क्षेत्र को भारतीय इतिहास में विशिष्ट स्थान प्रदान किया है। मध्यकाल में इस क्षेत्र पर शासन करने वाले खरवार वंश के शासकों ने न केवल अपनी राजनीतिक शक्ति का परिचय दिया, बल्कि धर्म, संस्कृति और लोककल्याण के क्षेत्र में भी अमिट योगदान दिया। इन्हीं महान शासकों में राजा प्रताप धवलदेव का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।

बारहवीं शताब्दी के इस महान खरवार शासक ने रोहतास और कैमूर क्षेत्र में अनेक धार्मिक और जनोपयोगी कार्य कराए। उनके द्वारा स्थापित शिलालेख आज भी उनके शासन, प्रशासन, धार्मिक आस्था और जनकल्याणकारी दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। तारा चंडी, तुतला भवानी और फुलवरिया के शिलालेख उनके गौरवशाली शासन की कहानी कहते हैं।

खरवार वंश और रोहतास क्षेत्र

खरवार वंश का इतिहास बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है। यह वंश मुख्य रूप से कैमूर और रोहतास की पर्वतीय पट्टी में शक्तिशाली रूप से स्थापित था। मध्यकाल में जब उत्तर भारत में विभिन्न राजवंश सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब रोहतास क्षेत्र में खरवार नरेशों ने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी।

राजा प्रताप धवलदेव इसी गौरवशाली वंश के प्रमुख शासक थे। उनके शासनकाल में रोहतास क्षेत्र राजनीतिक रूप से संगठित तथा सांस्कृतिक रूप से समृद्ध था। उनके अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि वे केवल योद्धा नहीं, बल्कि दूरदर्शी प्रशासक और धर्म संरक्षक भी थे।

तारा चंडी मंदिर और प्रताप धवलदेव

सासाराम का प्रसिद्ध तारा चंडी मंदिर बिहार के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। यह मंदिर कैमूर पहाड़ियों की प्राकृतिक गुफा में स्थित है और सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है।

माँ तारा की प्रतिमा तांत्रिक परंपरा के अनुसार निर्मित है। देवी के चार हाथ हैं। दाहिने हाथों में खड्ग और कैंची तथा बाएँ हाथों में मुंड और कमल है। देवी शव पर खड़ी हैं तथा उनका बायाँ पैर आगे की ओर है। उनका नीलवर्ण स्वरूप तंत्र साधना में वर्णित तारा महाविद्या के रूप से मेल खाता है। कटि पर व्याघ्रचर्म धारण किए हुए यह प्रतिमा प्राचीन भारतीय प्रतिमा कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

मंदिर परिसर में स्थित शिलालेख से ज्ञात होता है कि राजा प्रताप धवलदेव ने अपने पुत्र शत्रुधन के माध्यम से यहाँ अभिलेख अंकित करवाया था। यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि बारहवीं शताब्दी तक तारा चंडी देवी की ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी। खरवार शासक इस शक्ति परंपरा के संरक्षण और प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।

मंदिर परिसर में उपलब्ध सूर्य देव और अग्नि देव की मूर्तियाँ गुप्तकाल अथवा परवर्ती गुप्तकाल की मानी जाती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र प्रताप धवलदेव के काल से भी कई शताब्दियों पूर्व धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा था।

तुतला भवानी और प्रताप धवलदेव का शिलालेख

रोहतास जिले के तिलौथू प्रखंड के निकट स्थित तुतला भवानी बिहार के सबसे सुंदर प्राकृतिक स्थलों में से एक है। ऊँची-ऊँची पहाड़ियों के बीच बहती कछुअर नदी, हरी-भरी घाटी और लगभग 180 फीट ऊँचा जलप्रपात इस स्थान को अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य प्रदान करते हैं।

इस स्थल का ऐतिहासिक महत्व भी उतना ही बड़ा है। यहाँ माँ जगद्धात्री महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा के समीप राजा प्रताप धवलदेव का महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त हुआ है। यह शिलालेख 1 अप्रैल 1158 ईस्वी (विक्रम संवत् 1214) का है।

शिलालेख यह दर्शाता है कि राजा प्रताप धवलदेव धार्मिक स्थलों के संरक्षण और विकास के प्रति विशेष रूप से सजग थे। दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में स्थित इस देवी स्थल को राजकीय संरक्षण प्राप्त था। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि खरवार शासकों का प्रभाव केवल किलों और प्रशासनिक केंद्रों तक सीमित नहीं था, बल्कि वे धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थानों को भी संरक्षण देते थे।

आज तुतला भवानी स्थल को इको-टूरिज्म केंद्र के रूप में विकसित किया गया है। सड़क, झूला पुल और अन्य आधुनिक सुविधाओं ने इसे प्रमुख पर्यटन स्थल बना दिया है, किंतु इसकी ऐतिहासिक पहचान का आधार आज भी प्रताप धवलदेव का शिलालेख ही है।

फुलवरिया शिलालेख : खरवार इतिहास का दर्पण

फुलवरिया गाँव रोहतास जिले के तिलौथू प्रखंड के अंतर्गत कैमूर की पहाड़ियों पर स्थित है। यह क्षेत्र पुरातात्त्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

यहाँ प्राप्त प्रताप धवलदेव का शिलालेख खरवार वंश के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह अभिलेख 27 मार्च 1169 ईस्वी (विक्रम संवत् 1225) को अंकित कराया गया था। इसकी भाषा संस्कृत तथा लिपि प्रारंभिक नागरी है।

इस शिलालेख का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इससे खरवार वंश की वंशावली संबंधी जानकारी प्राप्त होती है। साथ ही यह शासक की जनकल्याणकारी नीतियों पर भी प्रकाश डालता है।

अभिलेख के अनुसार प्रताप धवलदेव ने पर्वतीय क्षेत्रों में मार्गों का निर्माण कराया, नदियों के ऊपर आवागमन की व्यवस्था विकसित की तथा सीढ़ियों का निर्माण करवाया। यह कार्य उस युग में अत्यंत महत्वपूर्ण था, जब पहाड़ी क्षेत्रों में यात्रा करना कठिन और जोखिमपूर्ण माना जाता था।

फुलवरिया शिलालेख
फुलवरिया शिलालेख

जनकल्याणकारी शासक के रूप में प्रताप धवलदेव

अधिकांश मध्यकालीन शासकों की पहचान युद्धों और विजयों से होती है, लेकिन प्रताप धवलदेव की पहचान उनके लोकहितकारी कार्यों से भी होती है।

उनके शिलालेखों से निम्नलिखित कार्यों का उल्लेख मिलता है—

  • पर्वतीय मार्गों का निर्माण
  • सोपान (सीढ़ियों) का निर्माण
  • धार्मिक स्थलों का संरक्षण
  • देवी मंदिरों का विकास
  • तीर्थयात्रियों की सुविधा हेतु व्यवस्थाएँ
  • सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों को प्रोत्साहन

इन कार्यों से स्पष्ट होता है कि वे जनता की आवश्यकताओं को समझने वाले संवेदनशील शासक थे।

रोहतासगढ़ और खरवार शक्ति

यद्यपि प्रताप धवलदेव के उपलब्ध शिलालेख मुख्य रूप से तारा चंडी, तुतला भवानी और फुलवरिया से प्राप्त हुए हैं, किंतु इतिहासकारों का मानना है कि रोहतासगढ़ दुर्ग पर खरवार शासकों का प्रभाव महत्वपूर्ण था।

कैमूर की ऊँची पहाड़ियों पर स्थित रोहतासगढ़ भारत के सबसे सुरक्षित और विशाल दुर्गों में गिना जाता है। यह दुर्ग मध्यकालीन राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र था। खरवार शासकों ने इस दुर्ग और उसके आसपास के क्षेत्रों में अपनी शक्ति स्थापित की थी। प्रताप धवलदेव के शासनकाल में रोहतास क्षेत्र राजनीतिक रूप से संगठित और सुदृढ़ था।

धार्मिक और सांस्कृतिक योगदान

प्रताप धवलदेव केवल राजनीतिक शासक नहीं थे। वे धर्म और संस्कृति के संरक्षक भी थे। उनके संरक्षण में शक्ति उपासना का व्यापक विकास हुआ। तारा चंडी और तुतला भवानी जैसे शक्ति स्थलों का महत्व उनके काल में और बढ़ा।

संस्कृत भाषा में शिलालेख लिखवाना यह दर्शाता है कि उनके दरबार में विद्वानों और पंडितों को सम्मान प्राप्त था। प्रारंभिक नागरी लिपि का प्रयोग उस समय की सांस्कृतिक उन्नति का प्रमाण है।

इतिहास में प्रताप धवलदेव का स्थान

राजा प्रताप धवलदेव का महत्व केवल रोहतास या कैमूर क्षेत्र तक सीमित नहीं है। उनके शिलालेख मध्यकालीन बिहार के इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इन अभिलेखों के माध्यम से उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था, धार्मिक जीवन, स्थापत्य गतिविधियों और सामाजिक परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त होती है।

उनके द्वारा कराए गए निर्माण कार्य यह प्रमाणित करते हैं कि वे दूरदर्शी और प्रजावत्सल शासक थे। इसी कारण आज भी रोहतास क्षेत्र की लोकस्मृतियों में उनका नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है।

उपसंहार

राजा प्रताप धवलदेव खरवार वंश के उन महान शासकों में थे जिन्होंने रोहतास और कैमूर क्षेत्र को राजनीतिक स्थिरता, धार्मिक संरक्षण और सांस्कृतिक समृद्धि प्रदान की। तारा चंडी मंदिर, तुतला भवानी शिलालेख और फुलवरिया अभिलेख उनके यशस्वी शासन के जीवंत प्रमाण हैं।

उन्होंने दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में मार्ग बनवाए, धार्मिक स्थलों को संरक्षण दिया और अपनी प्रजा के जीवन को सुगम बनाने के लिए अनेक जनोपयोगी कार्य किए। यही कारण है कि आज भी वे रोहतास के इतिहास में एक आदर्श शासक, धर्मरक्षक और लोककल्याणकारी नरेश के रूप में स्मरण किए जाते हैं।

राजा प्रताप धवलदेव का जीवन हमें यह सिखाता है कि किसी शासक की महानता केवल उसकी सैन्य शक्ति में नहीं, बल्कि उसकी प्रजा, संस्कृति और विरासत के प्रति समर्पण में निहित होती है।

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